कामायनी महाकाव्य में नारी
| Vol-07 | Issue-08 | August-2020 | Published Online: 05 August 2020 PDF ( 175 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डा0 सुभाष कुमार 1 | ||
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1असिस्टेन्ट प्रोफेसर हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय जखोली, रूद्रप्रयाग (उत्तराखण्ड) |
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| Abstract | ||
कामायनी हिन्दी भाषा एक महाकाव्य है। इसके रचयिता छायावादी युग के प्रमुख साहित्यकार जयश्षंकर प्रसाद जी हैं। यह आधुनिक छायावादी युग का सर्वोत्तम और प्रतिनिधि महाकाव्य है। प्रसाद जी की यह अतिंम काव्य रचना 1936 ई0 में प्रकाशित हुई, परन्तु इसका प्रणयन प्रायः 7-8 वर्ष पूर्व ही हो गया था । इस महाकाव्य की आधारभूमि प्रसाद जी ने काशमीरी शैव प्रत्यभिज्ञा दर्शन पर आधारित है। इस महाकाव्य में प्रसाद जी ने चिंता से प्रारम्भ कर आन्नद तक पन्द्रह सर्गों के इस महाकाव्य में मानव मन की विविध अंतवृत्तियों का क्रमिक उन्मीलन इस कौशल से किया है कि मानव सृष्टि के आदि से अन्त तक के जीवन के मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास का इतिहास भी स्पष्ट हो जाता है। कामायनी में प्रसाद जी ने नारी के स्वरूप को उदाŸा रूप में चित्रित किया है। प्रसाद जी की दृष्टि मंे नारी श्रृद्धा, दया, माया, ममता, और त्याग की प्रतिमूर्ती है, इसिलिए उन्होंने कामायनी में नारी के आर्दश रूप को चित्रित किया है। आपके इसी दृष्टिकोंण ने ही कामायनी को दार्शनिक सांस्कृतिक व साहित्यिक रूप में उत्कृष्ट रचना बनाया हैंै। सम्पूर्ण कामायनी महाकाव्य में प्रसाद जी ने नारी के स्वरूप को सौन्दर्य, प्रेम, आशा, समर्पण भाव, लज्जा, करूणा और महामानवी के रूप में प्रस्तुत किया है। कामायनी में ही प्रसाद जी ने श्रृद्धा के माध्यम से ही नारी के लोककल्याणकारी रूप को प्रस्तुत किया है। वास्तव में जयशंकर प्रसाद जी ने कामायनी में एक आदर्श स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया हैं। आपने कामायनी में ही इड़ा के माध्यम से बौद्धिक आधार पर बौद्धिक स्त्री की कल्पना भी की है। जो बुद्वि का प्रतीक है। स्त्री और पुरूष सृष्टि के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस रूप से भी प्रसाद जी ने कामायनी में नारी के महत्व को रेखाकिंत किया है। आपने नारी को हृदय व बुद्वि का प्रतीक माना है। |
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