मध्यकालीन हिंदी संतों की आर्थिक दृष्टि
| Vol-8 | Issue-01 | January-2021 | Published Online: 15 January 2021 PDF ( 115 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i01.015 | ||
| Author(s) | ||
| मनजीत कौर 1 | ||
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1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
मध्ययुगीन समाज में जहाँ एक ओर तलवार की नोक पर ऐश्वर्य एवं स्वच्छंदता के खेल खेले जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर आर्थिक विषमता के कारण मनुष्य-मनुष्य का भक्षण करने को तत्पर हो रहा था। एक ओर गगनचुम्बी भव्य भवनों में स्वर्ग की झाँकियाँ प्रस्तुत थी, तो दूसरी ओर दरिद्रता से जर्जर सामान्य जन दयनीय अवस्था के जीवित चित्र बने हुए थे। उस काल की अधिकांश जनता निर्धनता तथा अभावों में पल रही थी। आजीविका के लिए उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ता था। परिणामस्वरूप उनके जीवन का स्तर क्रमशः नीचे ही होता गया। निम्न वर्ग के लोगों की आर्थिक दशा अत्यन्त शोचनीय एवं दयनीय थी। यह वर्ग उच्च वर्ग के लोगों के अन्याय की चक्की में पिस-पिसकर अपना मनोबल नष्ट कर चुका था। भारतीय जनता के मन में एक अजीब-सी शून्यता छाई हुई थी। डॉ. ईश्वरीप्रसाद ने लिखा है कि, यही कारण है कि हिंदू समाज के बहुत बड़े भाग ने आक्रांताओं का प्रतिरोध करने में कुछ भी उत्साह नहीं दिखलाया था, वह एक शांत और गंभीर निराशा में पड़ा रहा। मध्यकालीन हिंदी संतों की वाणी का अनुशीलन करने पर तत्कालीन भारतीय समाज की आर्थिक परिस्थितियों का पता चलता है। |
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| Keywords | ||
| अर्थव्यवस्था, पुरुषार्थ, आर्थिक विषमता, संतवाणी। | ||
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