जनमत निर्माण में प्रिंट मीडिया की भूमिका: ब्रिटिश काल के विशेष सन्दर्भ में
| Vol-5 | Issue-02 | February-2018 | Published Online: 05 February 2018 PDF ( 134 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| एकता 1 | ||
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1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय (पंजाब) |
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| Abstract | ||
विचारों और भावनाओं को शाश्वत स्वरूप प्रदान करने के लिए लिखित शब्दों की भूमिका सदियों पुरानी है। इसका प्रारम्भिक इतिहास पाषाणकाल में गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य द्वारा बनाये गये भित्ति चित्रों में तलाशा जा सकता है। भय से लेकर आनंद तक ही हर क्षणिक भावनाओं को चित्रों ने युगों बाद आज भी शाश्वत कर रखा है। तमाम इलेक्ट्रानिक माध्यमों के अस्तित्व में आने के बावजूद लिखित शब्दों की महिमा आज भी बनी हुई है। आज भी गांव के चैराहों या चाय की दुकानों में आप को ऐसी चर्चा करते हुए लोग मिल जाऐंगे जो बातों में ताल ठोंक कर कह रहे होंगे-यकीन न हो तो देख लो अखबार में लिखा है। यकीनन सिर्फ अखबार में लिख देने से असत्य सत्य नहीं हो जाता लेकिन यह जनविश्वास है कि अखबारों में लिखा पत्थर की लकीर होता है। अखबार ने यह विश्वसनीयता एक दिन में नहीं अर्जित की है। इसके पीछे न जाने कितने योद्धा पत्रकारों की सदियों पुरानी तपस्या है। गांधी से लेकर राजाराममोहन राय तक न जाने कितने पत्रकारों ने स्वयं को तिल-तिल कर जलाया है। |
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| Keywords | ||
| प्रिंट, मीडिया, इलेक्ट्रानिक, पत्रकार, जनमत निर्माण, समाचार पत्र। | ||
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