भरतोक्त ’अंगरचना’ आहार्य अभिनयाचा नाटयसृष्टीच्या संदर्भात विचार: वर्णरचना
| Vol-8 | Issue-09 | September-2021 | Published Online: 13 September 2021 PDF ( 239 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i09.012 | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rishikesh Meena 1 | ||
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1Assistant Professor, Govt. Shastri Sanskrit College, Chauth Ka Barwara (Sawai Madhopur) |
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| Abstract | ||
अंगरचना विधी हा एक महत्त्वपूर्ण आहार्य विधी आहे. आहार्य अभिनयाच्या या प्रकारामुळे नाट्यात आहार्याचे महत्त्व वाढते, कारण नाट्याच्या वेळी प्रस्तुतीकरणात वेश सर्वप्रथम महत्त्वाचा असतो, त्यानंतर इतर अभिनय येतात. विशिष्ट व्यक्तीच्या चरित्राला नटाच्या माध्यमाने प्रस्तुत करण्याचा प्रयत्न म्हणजे अंगरचना आहार्य होय. |
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| Keywords | ||
| अंगरचना, चरित्राला, अभिनय, वेश | ||
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