भारतीय समाज में अपराधीकरण: सामान्य विश्लेषण
| Vol-5 | Issue-03 | March-2018 | Published Online: 05 March 2018 PDF ( 138 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाँ बलवीर सेन 1 | ||
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1सह-आचार्य (समाजशास्त्र) राजकीय महाविद्यालय, मेड़ता सिटी, नागौर (राज0) |
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| Abstract | ||
सामाजिक जीवन की अनेक समस्याओं में बाल एवं युवा अपराध की समस्या एक सार्वभौमिक चिन्ता का विषय है। आधुनिक समाज वृहद परिवर्तन और विघटन के दौर से गुजर रहा है। सामाजिक व्यवस्था में, समाज में तेज और असामान्य परिवर्तन असामंजस्य पैदा कर रहे हैं। बाल अवयस्क और युवापीढ़ी इनसे प्रभावित होती जा रही है। भारत में किशोर अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है न केवल लड़कों में बल्कि लड़कियों में भी अपराधी प्रवृत्ति तेज होती जा रही है। औद्योगिक केन्द्रों की गन्दी बस्तियों में स्थान के अभाव में किशोर साधारणतः गलियों में घूमते रहते है चैराहों पर खेलते रहते हैं तथा अभावों के बीच पलने के कारण छोटे-छोटे आर्थिक प्रलोभनों की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे किशोर स्कूलों से भागते हैं आवारागर्दी करते हैं, जेब काटने का काम भी सीख लेते हैं, जुआ खेलते हैं और शराब पीते है और गली मोहल्ले में लड़कियों को छेड़ते है। वर्तमान में लड़कियां भी इस ओर बढ़ रही हैं ऐसे अपचारी युवक-युवतियों का कुप्रभाव उन किशोरों पर भी पड़ता है जो इनकी संगति में पड़कर समाज विरोधी कार्य करने लगते हैं। |
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| Keywords | ||
| समाज, सामाजिक संरचना, अपराध, भारत। | ||
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