आलोचना साहित्य में शिवप्रसाद सिंह का योगदान
| Vol-4 | Issue-04 | April-2017 | Published Online: 05 April 2017 PDF ( 135 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| कमलेश चौधरी 1 | ||
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1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
आलोचना के कार्य पूर्व निश्चित सिद्धान्तों को आलोच्य पर आरोपित करना नहीं है। न आलोच्य के भीतर से उन्हें मनमाने ढंग से निकाल लेने का नाम ही आलोचना है। समर्थ आलोचक आलोच्य की विवेचना में अपनी परम्परा को नया संदर्भ देता है, उसे नवीन जीवन चेतना से संपृक्त करके प्राणवान बनाता है। पर ऐसा वहीं कर सकता है जो अपनी साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत से पूर्णतः अभिज्ञ होने के साथ-साथ आधुनिक जीवन चेतना के प्रति सम्यक संवेदनशील हो। एक-एक गाँठ हल्दी के पूँजी बल से महाजन मुद्रा में इतराने वाले अन्यथा ख्यात लोगों की तरह शिवप्रसाद सिंह ने शगूफे के बल पर साहित्य की दुनिया में मुखियागीरी करने का कभी सपना नहीं पाला। उनकी युवा मेधा और श्रमनिष्ठा से प्रेरित होकर ‘कीर्तिलता और अवहट्ठ भाषा’ शीर्षक आरम्भिक अनुशीलन कार्य को देखकर बीहड़ पथ के मनीषी यात्री राहुल सांकृत्यायन ने शुभाशंसा प्रकट की थी, ‘बीहड़ पथ को एक सबल पैर’ मिला और विस्मित मुद्रा में भाषा शास्त्री डाॅ. उदय नारायण तिवारी ने अपने मित्र पं. वाचस्पति पाठक से पूछा था, ‘कीर्तिलता और अवहट्ठ भाषा’ तथा ‘सूर पूर्व ब्रजभाषा और साहित्य’ के अध्येता और कहानीकार शिवप्रसाद सिंह एक ही व्यक्ति है, ‘उत्तरयोगी’ नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ देखकर भी कुछ लोगों ने विस्मय विद्रूप किया था और अपनी सिद्ध कूट बुद्धि से कथा शिल्पी शिवप्रसाद सिंह की छवि पर कटाक्ष किया था, मगर उनकी छवि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धूमिल नहीं हुई। |
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| Keywords | ||
| आलोचना, कीर्तिलता, विधापति, अस्तित्ववाद। | ||
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