केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में राज्य स्वायत्तता की चुनौतियाँ और संभावनाएँ

Vol-2 | Issue-8 | August-2015 | Published Online: 10 August 2015    PDF ( 284 KB )
Author(s)
Dr. Suman Kujur 1

1Assistant Professor, Department of Political Science, B.S College, Lohardaga, Ranchi University, Ranchi

Abstract

यह अध्ययन भारत में केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में राज्य स्वायत्तता की चुनौतियों और संभावनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारत की संघीय व्यवस्था संविधान द्वारा निर्धारित शक्तियों के विभाजन पर आधारित है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों की स्पष्ट संरचना बनाई गई है। राज्य स्वायत्तता का तात्पर्य राज्यों की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से वे अपने प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक मामलों में स्वतंत्र रूप से नीतियाँ बना सकें और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार विकास को दिशा दे सकें। अध्ययन में यह पाया गया कि व्यवहारिक स्तर पर कई कारक राज्य स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं, जैसे राजकोषीय निर्भरता, राज्यपाल की भूमिका, अनुच्छेद 356 का संभावित दुरुपयोग, केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता, अखिल भारतीय सेवाओं का नियंत्रण तथा योजनाओं का केंद्रीकरण। इन चुनौतियों के बावजूद सहकारी संघवाद, जीएसटी परिषद, नीति आयोग, वित्त आयोग की सिफारिशें, क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका और प्रतिस्पर्धी संघवाद जैसी प्रवृत्तियाँ राज्यों की स्वायत्तता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं।

Keywords
केंद्र-राज्य संबंध, राज्य स्वायत्तता, सहकारी संघवाद, राजकोषीय संघवाद, संघीय व्यवस्था, नीति आयोग, जीएसटी परिषद
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