बिहारी महादलित समाज की समस्या एवं समाधान

Vol-8 | Issue-08 | August-2021 | Published Online: 20 August 2021    PDF ( 236 KB )
DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i08.007
Author(s)
अर्चना कुमारी 1

1शोध-छात्रा, समाजशास्त्र विभाग, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा

Abstract

प्राचीन काल से वत्र्तमान काल तक बिहार के महादलितों की जीवन यात्रा पर अगर दृष्टिपात किया जाए, तो ऐसा ज्ञात होता है कि महादलितों को अनेकानेक सामाजिक बंधनों, बर्बर अत्याचारों, हिन्दू शास्त्रों एवं धर्माचारों द्वारा खोदी गयी गहरी खाइयों से गुजरना पड़ा है। भारतीय धर्मशास्त्रों में वर्णित वर्णव्यवस्था भारतीय इतिहास की विशिष्टतम और विलक्षण सामाजिक संस्था है जिसके तहत के बल पर आध्यात्मिक जगत के अग्रणी व्यक्ति एवं ब्राह्मण-पुरोहित वर्ग, आर्य- अनार्य के मध्य श्रेणीकरण श्रम विभाजन करके समाज को श्रेणीबद्ध करने में सफल हुए। वर्ण एवं जाति भेद के कारण ही अस्पृश्य जनित गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी, बीमारी, को नियति मानते हुए इसे पूर्वजन्म के दुष्चक्र के साथ जोड़ दिया और रही सही कसर शूद्र-महादलित जाति के नियंत्रण के लिए कठोर नियम बनाकर मनु ने मनुस्मृति मंे पूरी कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि जाति विभाजन सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों तक पहुँच गया जिसके कारण महादलित हर मानवीय सुविधाओं के प्रत्येक अवसर से वंचित हो गये। आजादी के कई वर्षों के उपरांत भी महादलितों की समस्याएँ आज भी हिमालय की तरह अडिग है। स्वतंत्रता के बाद से ही सरकार द्वारा सभी क्षेत्रों मंे अनेक सुधार कार्य करने का प्रयास किया गया है लेकिन आज हम 21वीं शताब्दी में प्रवेश करने के बावजूद भी बिहारी महादलित गुलामी की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाये हैं।

Keywords
सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, महादलित
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