भारत में भाषाई एवं क्षेत्रीय आंदोलनों का राज्य स्वायत्तता और संघीय राजनीति पर प्रभाव
| Vol-1 | Issue-4 | November-2014 | Published Online: 05 November 2014 PDF ( 293 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Suman Kujur 1 | ||
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1Assistant Professor, Department of Political Science, B.S College, Lohardaga, Ranchi University, Ranchi |
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भारत एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहु-क्षेत्रीय देश है, जहाँ सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं के कारण समय पर भाषाई और क्षेत्रीय आंदोलनों का उदय हुआ है। स्वतंत्रता के बाद इन आंदोलनों ने भारतीय संघीय व्यवस्था, राज्य स्वायत्तता और संघीय राजनीति के स्वरूप को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। भाषाई आंदोलनों ने मुख्यतः भाषा, सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक मान्यता से जुड़ी मांगों को सामने रखा, जिसके परिणामस्वरूप 1950 और 1960 के दशकों में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। 1956 के राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम ने राज्यों की सीमाओं को भाषाई आधार पर पुनः निर्धारित किया, जिससे प्रशासनिक दक्षता और क्षेत्रीय पहचान को मजबूती मिली। दूसरी ओर, क्षेत्रीय आंदोलनों ने आर्थिक असमानता, राजनीतिक उपेक्षा और संसाधनों के असमान वितरण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों का गठन इन आंदोलनों का प्रत्यक्ष परिणाम है। इन आंदोलनों ने क्षेत्रीय दलों के उदय को भी प्रोत्साहित किया, जिससे भारतीय राजनीति में बहुदलीय प्रणाली और गठबंधन सरकारों की प्रवृत्ति मजबूत हुई। साथ ही, इन आंदोलनों ने केंद्र-राज्य संबंधों, भाषा नीति और क्षेत्रीय पहचान के प्रश्नों को भी प्रभावित किया। इस प्रकार, भाषाई और क्षेत्रीय आंदोलनों ने भारतीय संघवाद को अधिक सहभागी, विकेंद्रीकृत और लोकतांत्रिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। |
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| Keywords | ||
| भाषाई आंदोलन, क्षेत्रीय आंदोलन, राज्य स्वायत्तता, संघीय राजनीति, भारतीय संघवाद, और क्षेत्रीय दल आदि। | ||
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