जूठन :एक मूल्यांकन
| Vol-8 | Issue-10 | October-2021 | Published Online: 15 October 2021 PDF ( 440 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i10.006 | ||
| Author(s) | ||
डॉ संदीप
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1एसोसिएट प्रोफेसर, मोतीलाल नेहरु कॉलेज, दिल्ली विश्विद्यालय, दिल्ली |
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| Abstract | ||
ओमप्रकाश वाल्मीकि, हिंदी दलित साहित्य के प्रमुख लेखक, अपनी आत्मकथा जूठन के माध्यम से व्यापक मान्यता प्राप्त हुए। यह संस्मरण, जिसे कई भाषाओं में अनुवादित किया गया है, भारतीय दलित जीवन की कठोर वास्तविकताओं को चित्रित करता है। यह पाठ जाति व्यवस्था की आलोचना करता है और दलितों द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक-सांस्कृतिक अन्याय की समस्याओं को उजागर करता है। वाल्मीकि की कहानी केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं है बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त प्रणालीगत भेदभाव पर एक व्यापक टिप्पणी है। जूठन वाल्मीकि के सामाजिक और शैक्षिक विषमताओं के अनुभवों और अछूतपन की व्यापक प्रथा में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। आत्मकथा जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष और प्रतिरोध की एक सशक्त खोज है, जो लेखक की सहनशीलता और सामाजिक परिवर्तन की वकालत को दर्शाती है। जूठन के माध्यम से, वाल्मीकि न केवल अपनी व्यक्तिगत चुनौतियों का दस्तावेज करते हैं, बल्कि जाति और सामाजिक न्याय पर बड़े विमर्श में योगदान करते हैं, समानता और मानव गरिमा की वकालत करते हैं। |
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| Keywords | ||
| जूठन, दलित साहित्य, जाति व्यवस्था, सामाजिक अन्याय, आत्मकथा, अछूतपन, सामाजिक परिवर्तन | ||
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Statistics
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