मध्यकाल में मुद्रा व्यवस्था

Vol-5 | Issue-03 | March-2018 | Published Online: 05 March 2018    PDF ( 164 KB )
Author(s)
संध्या रानी 1

1यू॰जी॰सी॰ नेट, इतिहास कानपुर, उ॰प्र॰, भारत

Abstract

मुगलकाल मे ऋण के रूप में लगी हुई राषि बड़ी मात्रा में प्रचलन में थी तथा षाह एवं साहुकार बड़ी मात्रा में राषि उधार देने की स्थिति में थे। वस्तुतः उधार लेने-देने में लगी हुई पूंजी की प्रादुर्भाव दो अवस्थाओं में ही देखा जा सकता है। प्रथम-ऋण के कारोबार से पूंजी का पूर्णतः संकलन होना, द्वितीय-आर्थिक जीवन के अन्य स्त्रोतों से धन संकलन कर ऋण कारोबार में लगाना। आदिम कृशि समाज में ये दोनो स्त्रोत एक-दूसरे से जुड़े हुए थे क्योंकि ऋणदेय वित्त अपने में अलग से कोई अस्तित्व नहीं रखता समाज द्वारा स्वीकृत सामाजिक अधिकारों के आधार पर ग्रामीण मुखियां भूमि के उत्पादन के एक भाग पर अपने अधिकार का दावा करता था तथा तत्पष्चात् बीज व जानवर देने के बदले अतिरिक्त धन की मांग करता था। व्यावसायिक ऋणदाताओं के वर्ग की रचना- जैसा कि लोग ऋ़णदेय व्यवसाय से लाभ प्राप्त करते थे तथा इस लाभ द्वारा अपनी पूंजी में वृद्धि करते थे- समाज के आर्थिक विकास को दर्षाती है। षोशण के अन्य साधनों से सूदखोरी अलग होने की व्यवस्था प्रत्येक सभ्य देष में काफी पहले प्रारम्भ हो गई थी तथा भारत कोई अपवाद नहीं था। सूदखोरी के इस विभाजन को कानूनी दर्जा समाज के चार वर्गों में से दो उच्च वर्गों पर ऐसा करने पर पाबंदी लगने से प्राप्त हुआ और यह कार्य स्वाभाविक रूप से तृतीय वर्ग वैष्य को प्राप्त था।

Keywords
जातीय-व्यवस्था, समाज, साहुकार, मुद्रा एवं माप-तौल।
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