राजस्थान जैसे प्रदेष में जो सामन्ती शासन व्यवस्था के कारण हर क्षेत्र में अन्य राज्यों की तुलना में पिछड़ा हुआ रहा है, यद्यपि पत्र पत्रिकाओं का प्रादुर्भाव बहुत विलम्ब से हुआ, तथापि अपने एक शताब्दी के इतिहास में अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहते हुए भी उन्होंने भाषा और साहित्य के विकास में जो उल्लेखनीय योगदान किया है, उसका आकलन एक स्वतंत्र ग्रन्थ का विषय है।’’ राजस्थान में पत्र-पत्रिकाओं का दीर्घ जीवन दुर्लभ ही रहा। कुछ पत्र बन्द हुए, तो कुछ नये निकले, किंतु उनके प्रकाषन का सिलसिला बराबर जारी रहा। राजस्थान की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के योगदान को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने पर ज्ञात होता है कि उन्नीसवीं सदी के अन्तिम चरण में हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल खड़ी बोली के स्वरूप को विकसित करने में सहयोग दिया, अपितु उसके माध्यम से राजनीति, इतिहास, षिक्षा और विज्ञान आदि विषयों की जानकारी जन-सामान्य तक पहुँचाई, जो उस युग की सबसे बड़ी आवष्यकता थी। इसके बाद बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भी प्रदेष से जो पत्र-पत्रिकाएॅँ राजस्थान से निकली चाहे वे साप्ताहिक हो या मासिक हो या त्रैमासिक, उन्होंने भी हिन्दी की तत्कालीन धारा के साथ अपना संगम स्थापित कर गद्य और पद्य की भाषा के स्वरूप को विकसित करने, साहित्य के प्रति लोगों में रूचि विकसित करने, लेखकों का एक समुदाय खड़ा करने और उनसे विविध विधाओं में रचनाएँँ लिखवाने की प्रेरणा देने का ऐतिहासिक कार्य किया। हिन्दी के परिष्कार और उसके प्रांजल स्वरूप के विकास में राजस्थान के तत्कालीन पत्रों का योगदान किस सीमा तक रहा, इसे समझने के लिए ‘समालोचक‘ से एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है:- ‘‘बांग्लादेष में कोलाहल के साथ-साथ स्वदेषी वस्तुओं के प्रचार का आन्दोलन फैलता जा रहा है। गाँव-गाँव में सभा होती है। स्वदेषी आंदोलन देष भर में व्याप्त होना चाहिए। बंगाली पंडितों ने शास्त्रों में से स्वदेषी वस्तुओं के श्लोक खोजने आरम्भ किये है।‘‘ उक्त उद्धरण से इतना स्पष्ट है कि यहाॅँ के पत्रकार हिन्दी गद्य में पंडिताऊ पत्र के समर्थक नहीं थे। वे सीधी और बोधगम्य हिन्दी के पक्षधर थे। निष्चय ही राजस्थान की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाषित कथाओं के माध्यम से आज के मनुष्य के अस्तित्व और उसके द्वन्द्वात्मक पक्ष तथा संघर्ष को वाणी दी है और इस प्रकार अपने युग को प्रतिबिम्बित करने में अपना योगदान किया है।
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