’संप्रेषण’ पत्रिका में समकालीन कविता’
| Vol-5 | Issue-02 | February-2018 | Published Online: 05 February 2018 PDF ( 162 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| उर्मिला कुमारी यादव 1 | ||
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1शोधार्थी, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
कविता मूलः स्मृतिलक्षणा होती है तथा अपने इसी रूप में वह युगों पूर्व समक्ष आयी। वह स्मृति में जन्म लेकर, स्मृति में ही बनी रहती है तथा अन्ततः कवि भी वह स्मरणीय बना देती है। ’संप्रेषण’ पत्रिका का अपना एक विकास रहा है जिसमें सभी प्रतिमाओं को आगे आने का स्वर्णिम अवसर मिला है तथा समर्थ, लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों की कविताओं को पढ़ने तथा उनक¢ बारे में जानकारी प्राप्त करने का भी विशिष्ट अवसर मिला है। ’संप्रेषण’ पत्रिका क¢ कुछ अंक तो इस प्रकार क¢ रहे हैं जो कि विशिष्ट रूप से उन कवियों पर क¢न्द्रित रहे हैं। समकालीन कविता की सभी विशेषताओं को अपने में समेटे हुए है।यह पत्रिका अपनी विशिष्ट पहचान बनाये हुए है। समकालीन कविता वह कविता है जो एक समय विशेष में समान संदर्भों का द्योतन करती है। कविता का यह समान संदर्भ संकुचित न होकर नितांत व्यापक है। जब कोई रचनाकार अपने देश, समाज या व्यक्ति क¢ जीवन काल में घटित घटना का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होकर उसक¢ तथ्यों का यथार्थपूर्ण काव्यांकन करता है तो वह कविता समकालीन कविता कहलाती है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, मानवीय तथा सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक बोद्य, राजनीतिक चेतना, ग्रामीण तथा नगरीय जीवन का चित्रण, प्रकृति चित्रण तथा शिल्प क¢ प्रति नवीनता का आग्रह आदि समकालीन कविता की प्रमुख विशेषताओं को इन कवियों ने अपनी कविताओं में समाहित किया है। |
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| Keywords | ||
| संप्रेषण, समकालीन, आधुनिक, हस्तलिपि, संरक्षण, संघर्षरत, तज्जन्य, लब्धप्रतिष्ठ। | ||
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