हिन्दी ग्रामीण उपन्यास : परिवर्तित चेतना
| Vol-2 | Issue-7 | July-2015 | Published Online: 10 July 2015 PDF ( 287 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rekha Mishra 1 | ||
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1Lecturer Hindi, Government College, Bibirani (Alwar), Rajasthan |
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| Abstract | ||
ग्रामीण परिवेश हमारी मूल सामाजिक सांस्कृतिक अस्मिता को दर्शाने का मुख्य आधार है। इसीलिए महात्मा गांधीजी ने कहा था कि भारत गांव में बसता है । समय के साथ भारतीय ग्रामीण समाज के सामने कई तरह की चुनौतियां आई है और साथ ही ग्रामीण परिवेश में व्यापक परिवर्तन भी हुए हैं। जिसके कारण गांव का जीवन बहुत ही जटिल होता जा रहा है। बदलते परिवेश के संदर्भ में ग्रामीण जीवन की वैचारिक एवं भावनात्मक मानसिकता को ग्राम चेतना कहा जा सकता है। “परंपरा और नवीनता के प्रश्न को लेकर आलोचकों ने अतिवादी एकदेशीय उत्तर देने का प्रयास किया।…… नवीनता के आगमन से पूर्व परंपरागत व्यवस्थाओं का एक अचेतन संगठन अपने को दोहराते रहता है पर नवीनता की आगमन के साथ ही उक्त स्थिर संगठन में संशोधन की प्रक्रिया आरंभ होने लगती है। इस प्रक्रिया में नई और पुरानी व्यवस्थाएं परस्पर पूरक परिवर्तनों के पश्चात एक नितान्त व्यवस्था में रूपांतरित हो जाती हैं। इस प्रकार नवीनता का परंपरा से नाता जुड़ जाता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि नवीनता के द्वारा परंपरागत तत्वों को स्वीकृत किया जाता है अपितु यह होता है कि सर्वप्रथम अपनी गत्यात्मकता के कारण प्रत्येक नवीनता पुरानी व्यवस्था के साथ विरोध करती है और तत्पश्चात अपने समेत संपूर्ण व्यवस्था में उचित बदलाव कर उसका अभिन्न हिस्सा बन जाती हैं। इसलिए परंपरा सुसंगति स्थापित करने के लिए नवीनता को पहले परंपरा से असंगत होना आवश्यक है।” |
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| Keywords | ||
| उपन्यास, साहित्य, ग्रामीण चेतना, हिंदी, आधुनिकता एवं पारंपरिकता | ||
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