मार्कण्डेय के कहानी साहित्य में चित्रित ग्राम्य-जीवन एवं आर्थिक परिवेश: सामान्य विश्लेषण
| Vol-8 | Issue-01 | January-2021 | Published Online: 15 January 2021 PDF ( 232 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i01.019 | ||
| Author(s) | ||
| अरविन्द कुमार शर्मा 1 | ||
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1शोधार्थी, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
आजादी के बाद इसी आर्थिक विषमता को नष्ट करने के उद्देश्य से सरकारी स्तर पर जमींदारी उन्मूलन, पंचवर्षीय विकास योजनाएँ, सामुदायिक विकास योजनाएँ, कुटीर उद्योग, पंचायत, चक-बंदी. भूदान, सहकारी खेती, कृषि विकास आदि अनेक प्रभावशाली नवीन आर्थिक कार्यक्रमों की घोषणाएँ हुई। ये कार्यक्रम कार्यान्वित भी हुए, परंतु इसका परिणाम यह हुआ कि गाँवों की आर्थिक स्थिति सुधरने के बजाय और भी बिगड़ती गई। गाँवों में स्थित किसान और भूमिहीन मजदूर वर्ग का जीवन यथास्थिति बना रहा। गरीबी, अभाव और भुखमरी बढती गई। सामाजिक जीवन की विसंगतियाँ बढ़ने लगीं। सामाजिक स्वास्थ्य खतरे में पड़ा। इस सबका प्रतिबिंब तत्कालीन कहानी साहित्य में पड़ना स्वाभाविक था। अतः कतिपय लेखकों के साहित्य में उक्त विसंगतियाँ कमोबेश चित्रित हुई मार्कण्डेय चूँकि ग्राम चेतना से जुड़े कहानीकार हैं, उन्होंने अपनी अनेक कहानियों में उपर्युक्त आर्थिक कार्यक्रमों के आलोक में भारत के गाँवों की आर्थिक बदहाली का बड़ा ही सजीव और मार्मिक वर्णन किया है। विशेषतया उनके भूदान‘ संग्रह की कहानियाँ इसी एक समस्या को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। मार्कण्डेय की कहानियों में चित्रित आर्थिक समस्या को निम्नांकित उपशीर्षकों में रखकर देखा जा सकता है। |
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| Keywords | ||
| ग्राम्य जीवन, आर्थिक परिवेश, सामाजिक असमानता, शोषक वर्ग। | ||
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