डाॅ0 शिवप्रसाद सिंह का नाट्य लेखन में योगदान: सामान्य विश्लेषण

Vol-8 | Issue-01 | January-2021 | Published Online: 15 January 2021    PDF ( 122 KB )
DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i01.014
Author(s)
डाॅ. विनोद शर्मा 1; कमलेश चौधरी 2

1सह-आचार्य, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)

2हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)

Abstract

वर्तमान युग में नाटक लिखने की प्रवृत्ति क्रमशः कम हो रही है। एकांकी नाटक, गीतिनाट्य, प्रतीकात्मक नाटक, रेडियो रूपक, भावनाट्य, एक पात्रीय आदि नाटक की विविध शैलियों का विकास हुआ है। इनके प्रति लोगों की विशेष रूचि है। डाॅ0 शिवप्रसाद सिंह ने नाट्य रचना के क्षेत्र में बहुत कम ही लेखन कार्य किया है। शिवप्रसाद सिंह के नाटक का लेखनकाल प्रसादोत्तर कालीन नाटक साहित्य के अन्तर्गत आता है। उन्होंने सन् 1965 में ‘घाटियाँ गूँजती है’ नामक लिखा है जो हिन्दी नाट्य-साहित्य की बहुतचर्चित रचना है। 1962 का भारत पर चीनी आक्रमण इस नाटक की पृष्ठ भूमि है। इसके अलावा ‘अश्मक का फूल’ शिवप्रसाद सिंह की दूसरी नाट्य रचना है। उन्होंने कुल दो नाटक ही लिखे है मगर अत्यन्त सफल नाटक है। ‘घाटियाँ गूँजती है’ हिन्दी नाट्य साहित्य की एक सफल त्रासिक कृति है।

Keywords
नाट्य लेखन, घाटियाँ गूँजती है, अश्मक का फूल।
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