मानवाधिकार की अवधारणा: सामान्य विश्लेषण

Vol-5 | Issue-12 | December-2018 | Published Online: 05 December 2018    PDF ( 130 KB )
Author(s)
Dr. Laxmi Narayan 1

1Assistant Professor (Political Science), Govt. College, Malsisar, Jhunjhunu, Rajathan

Abstract

मानवाधिकार प्रत्येक मनुष्य के लिए उसके सामाजिक वातवरण के स्वस्थ्य दृष्टिकोण के विकास हेतु महत्वपूर्ण अधिकार है। यह अधिकार हमें जन्म से प्राप्त है इसलिए इसकी प्राप्ति में जाति, धर्म, लिंग, भाषा, रंग, राष्ट्रीयता बाधक नहीं है। ये हमारे नैसर्गिक अधिकार है और इन अधिकारों का हनन ना हो ऐसी स्थिति में राज्य से मानवाधिकार अपेक्षा रखता है कि निर्माता होने के साथ-साथ संरक्षक भी रहे। ज्ञातव्य है कि मानवाधिकारों को पहचान देने और इन अधिकारों के अस्तित्व सशक्त करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आधार पर 10 दिसम्बर को अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। मानवाधिकार वस्तुतः वे अधिकार है, जो प्रत्येक मनुष्य को केवल और केवल इस आधार पर मिलना चाहिए क्योंकि वे मनुष्य है। वास्तव में इन्हें ‘बहुधा’, ‘मूल’ अथवा मौलिक अधिकार भी कहा जाता है। आज विश्व का कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जो किसी न किसी रूप में इन अधिकारों को मान्यता नहीं दिया अर्थात् विश्व के समस्त राज्यों ने इन अधिकारों को मान्यता प्रदान किया है संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अन्तर्गत भी मानव अधिकारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वर्तमान समय में विश्व में मानवाधिकारों के मामले पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है। यह एक अहम मुद्दा बन चुका है जिसे किसी भी परिस्थिति में नकारा नहीं जा सकता है। प्रश्न जो उपस्थित है कि यह बात उठी क्यों ? इन प्रश्नों के मूल तथ्य में केवल मनुष्य होना ही समस्त अधिकारों को प्रदान करता है। आज देखा जा सकता है कि विश्व के समस्त राज्यों, संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर सभी जगह इन्हें स्थान प्रदान किया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ का तो यह महत्वपूर्ण उद्देश्य ही है कि वह मानव अधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रता को जाति, भाषा, लिंग, धर्म आदि के भेदभाव के बिना प्रोत्साहित करें।

Keywords
मानवाधिकार, मौलिक अधिकार, स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय, राज्य।
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