राहुल सांकृत्यायन के यात्रा साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष

Vol-8 | Issue-01 | January-2021 | Published Online: 15 January 2021    PDF ( 117 KB )
DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i01.017
Author(s)
अरूण माधीवाल 1

1शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर।

Abstract

मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। अपनी बुद्धि के द्वारा मनुष्य अपने आस-पास की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता एवं उन्नत करता है। इस जीवन पद्धति में आचार-विचार, रीति-रिवाज़, रहन-सहन के माध्यम से वह उच्च दर्जा प्राप्त करता है। मनुष्य की इस मानसिक क्षेत्र की प्रगति से ही उसकी संस्कृति का परिचय होता है। संस्कृति मानव के शारीरिक और मानसिक संस्कारों का सूचक है अर्थात् संस्कृति से अभिप्राय मानव समाज के संस्कारों का परिष्कार और परिमार्जन है जो कि एक सतत् सर्जन प्रक्रिया है। राहुल सांकृत्यायन का यात्रा साहित्य भी देश-विदेश की सांस्कृतिक सम्पदा से भरा हुआ है। विभिन्न देशों की संस्कृति का स्पष्ट एवं विस्तृत वर्णन राहुल जी क¢ यात्रा साहित्य में देखने को मिलता है। देश-विदेश के लोगों के आचार-विचार, रहन-सहन, रीति-रिवाज़, वेशभूषा, पर्व-परम्पराओं क¢ माध्यम से राहुल जी ने अपने यात्रा साहित्य को सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न बनाया है।

Keywords
यात्रा साहित्य, सांस्कृतिक, किन्नर, जौनसार, लोकनाट्य।
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