अनुसूचित जाति के सन्दर्भ में मुसहर जाति का समाजशास्त्रीय विश्लेषण
| Vol-4 | Issue-09 | September-2017 | Published Online: 05 September 2017 PDF ( 141 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| डाँ बलवीर सेन 1 | ||
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1सह-आचार्य (समाजशास्त्र) राजकीय महाविद्यालय, मेड़ता सिटी, नागौर (राज0) |
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| Abstract | ||
मुसहर जाति का मूल (उत्पत्ति) कहां है और विभिन्न युगों में इनकी क्या स्थिति रही है ? इस प्रश्न का कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। इस बारे में भिन्न-भिन्न मत हैं मुसहर अपने को ’भारत के मूल निवासी मानते हैं और अपनी स्थिति यहां के अन्य जातियों एंव प्रजातियों से किसी तरह कम नहीं मानते। इनके अनुसार त्रेता युग में भक्तों में श्रेष्ठ ’सबरी’ हमारे वंशज हैं इन्होनें अपनी भक्ति के बल पर भगवान राम को अपने वश में किया तथा प्रेमानन्दित होकर रामचन्द्रजी ने सबरी के जूठे बेर को बारम्बार सराहना करते हुए खाये। भगवान राम के ये भक्त माने गये। राम ने स्वयं इन्हें विषेश महत्व प्रदान किया। सबरी घनघोर व एकांत जंगल में निवास करती थी और उसके पास अपनी जीविकोपार्जन के लिए कोई व्यवसाय नहीं था। अतः इसने जंगल के पत्तों को तोड़कर उसका पत्तल बनाना प्रारम्भ किया और अपनी आजीविका चलाने लगी। तब से मुसहरों का मुख्य व्यवसाय ’पत्ता बेचना’ एंव पत्ते से बने पत्तल बनाना हो गया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मुसहर जाति आदिम वंश परम्परा से जुड़ी है तथा इनके व्यवयाय की उत्पत्ति एंव प्रसार का भी एक ऐतिहासिक कारण रहा है। भले ही आज मुसहर आधुनिक तकनीकि का स्वीकार न करने के कारण पत्तल उद्योग से विमुख होते जा रहे हैं किन्तु वर्तमान में पत्तल बनाने वाली जाति के रुप में इनकी पहचान बरकरार है। |
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| Keywords | ||
| जाति, मुसहर, अनुसूचित, भारत। | ||
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