आदिवासी साहित्य, संस्कृति एवं उपन्यास: सामान्य अवलोकन

Vol-07 | Issue-12 | December-2020 | Published Online: 05 December 2020    PDF ( 221 KB )
DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2020.v07i12.010
Author(s)
डाॅ. करतार सिंह 1; कान्ति देवी मीना 2

1सह आचार्य, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

2शोधार्थी हिन्दी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)

Abstract

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अतः समाज में रहकर जीता है। उसी समाज का अपना साहित्य और अपनी संस्कृति होती है। मानवों की परम्परागत भावों और विचारों के संचित भंडार का नाम साहित्य है। साहित्य में किसी जाति, समाज एवं राष्ट्र के सभी भाव एवं विचार विद्यमान रहते है। साहित्य को सदैव परम्परा से प्रेरणा मिलती है। वह परम्परा से ही विचारों को ग्रहण करता है। परम्परा का संबंध संस्कृति से है। अतः संस्कृति ही किसी देश या राष्ट्र की परम्परा का निर्माण करती है और वह इस देश या राष्ट्र के साहित्य को प्रेरणा प्रदान करती है। इस दृष्टि से संस्कृति एक ऐसी सुदृढ़ नींव है, जिस पर साहित्य का विशाल भवन तैयार होता है। संस्कृति के मूल पर साहित्य का वृक्ष विकसित होकर पुष्पित एवं फलित होता है। साहित्य और संस्कृति एक सिक्के दो पहलु है। साहित्य के बिना संस्कृति पंगु है तो संस्कृति के बिना साहित्य अधुरी है। दोनों एक दूसरे के साथ जुड़कर समाज ही का कार्य कर सकते है। अकेला साहित्य कुछ नहीं कर सकता, तो अकेली संस्कृति अपना अस्तित्व नहीं टीका सकती। भारतीय साहित्य के द्वारा हम जान सकते है कि हमारी संस्कृति कितनी त्याग एवं भोग प्रधान है।

Keywords
आदिवासी, साहित्य, उपन्यास, संस्कृति, कथा साहित्य।
Statistics
Article View: 439