शीतयुद्धोत्तर काल में भारत अमेरिका संबंधों का बदलता-परिदृश्य
| Vol-2 | Issue-3 | March-2015 | Published Online: 05 March 2015 PDF ( 158 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| महेन्द्र कुमार पुरोहित 1 | ||
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1शोधार्थी, व्याख्याता (राजनीति विज्ञान) राजकीय दरबार आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, जोधपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
सोवियत संघ में गोर्बाचोव ने ’’ग्लास्नोस्त’’ और ’पेरेस्त्रोइका’ का एक नया अध्याय शुरू किया। 1990 के दशक के आरम्भ में सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध के अंत के बाद विश्व व्यवस्था में मौलिक परिर्वतन हुआ। नयी विश्व व्यवस्था में ’’संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र महाशक्ति रह गया है।’’ साथ गुट निरपेक्ष आन्दोलन के प्रभाव में भी कमी होना स्वाभाविक था। वैश्वीकरण और उदारीकरण की शुरूआत के पश्चात् सभी मुद्दे गोण हो गये और आर्थिक मुद्धे को प्राथमिकता दी जाने लगी। परिवर्तित वातावरण में अमेरिका ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत की भूमिका तथा महत्ता को पहचानना शुरू कर दिया। भारत द्वारा आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने से भी दोनों देशों के संबंधों में सुधार होने लगा। जहाँ शीत युद्ध काल में दोनों देशों के संबंधों में उत्तार-चढ़ाव होता रहा वही अब सोवियत संघ के विघटन के बाद बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भारत-अमेरिका संबंधों में क्या नये गतिरोध आयेंगे या मित्रता के नये चरण स्थापित होगें यही प्रस्तुत अध्याय का विषयवस्तु भी है। |
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| Keywords | ||
| शीतयुद्ध, भारत, अमेरिका, उदारीकरण, वैश्विकरण, ग्लास्नोस्त, पेरेस्त्रोइका। | ||
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