‘श्री दादूवाणी’ में समन्वय भावना
| Vol-07 | Issue-12 | December-2020 | Published Online: 05 December 2020 PDF ( 121 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2020.v07i12.009 | ||
| Author(s) | ||
| डॉ. श्रुति शर्मा 1 | ||
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1सह आचार्य, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर |
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| Abstract | ||
संत दादूदयाल भक्तिकाल के निर्गुण धारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के सर्वश्रेष्ठ संत कवि हैं। इन्होंने एक निर्गुण संप्रदाय की स्थापना की, जो ‘दादूपंथ’ के नाम से जाना जाता है। वे मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के समकालीन थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन राजपूताना में व्यतीत किया तथा हिन्दू और इस्लाम धर्म में समन्वय स्थापित करने के लिए अनेक पदों की रचना की। उनके अनुयायी न तो मूर्तियों की पूजा करते हैं और न कोई विशेष प्रकार की वेशभूषा धारण करते हैं। वे सिर्फ़ राम का नाम जपते हैं और शांतिमय जीवन में विश्वास करते हैं। |
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| Keywords | ||
| समन्वय, साम्यवाद, विषमता, सहिष्णुता, संप्रदाय, पंथ। | ||
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