शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में ग्रामीण यथार्थ
| Vol-8 | Issue-12 | December-2021 | Published Online: 15 December 2021 PDF ( 278 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i12.010 | ||
| Author(s) | ||
डॉ. श्रुति शर्मा
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1सह आचार्य, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर |
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| Abstract | ||
शिवप्रसाद सिंह स्वतंत्र्योत्तर नयी कहानी के पुरोधा साहित्यकार हैं। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के बाद बदलते ग्रामीण परिवेश का यथार्थ और नग्न चित्रण उनकी कहानियों में दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने व्यक्ति और समष्टि के विघटनकारी मूल्यों की बारीकियों की गहनता से पड़ताल की। कथा लेखन में जब उनका प्रवेश हुआ तब देश औद्योगिकीकरण, पंचवर्षीय योजना आदि तमाम विकासमान मूल्यों की तरफ गतिमान था। अम्बेडकर और गाँधी के प्रयास से दलितों में चेतना जागृत हो रही थी। गाँव का सामाजिक ढाँचा टूट रहा था। इस तरह की स्थिति में गाँव का एक परिवर्तित रूप दिखाई दिया जिसे शिवप्रसाद सिंह ने अपनी कहानियों में चित्रित किया। उनकी कहानियों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, जातिगत आदि विविध समस्याओं की अभिव्यक्ति मिलती है। इस सन्दर्भ में डॉ. विवेकी राय लिखते हैंकृ“बदले हुए गाँव और बिन बदली हुई गाँव के गरीबों की नियति से संबंधित सवालों को कथाकार शिवप्रसाद सिंह विविध कोणों से उठाते हैं। आर्थिक सवालों से तीखे सामाजिक सवाल हैं।”1 इनकी कहानियों का मूल कथ्य ग्राम जीवन पर आधारित होने के कारण, इन्हें प्रेमचंद की परम्परा से जोड़कर देखा जाता है। शिवप्रसाद सिंह के समय देश आज़ाद हो गया था, जमींदारी उन्मूलन भी हो गया था, जमींदार के रूप में ठेकेदार और पूंजीपति जैसी शोषणकारी शक्तियाँ पनप रहीं थीं लेकिन सामाजिक ढाँचे में कोई बदलाव नहीं आया था। जमींदारी खत्म होने के बाद भी जमींदारों द्वारा शोषण बरकरार है। |
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| Keywords | ||
| यथार्थ, औद्योगिकीकरण, आदर्शवाद, सामंती शोषण, परंपरा और आधुनिकता। | ||
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