हिंदी कविता में दलित चेतना और प्रतिरोध का स्वर
| Vol-1 | Issue-2 | September-2014 | Published Online: 05 September 2014 PDF ( 345 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rekha Mishra 1 | ||
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1Lecturer Hindi, Government College, Bibirani (Alwar), Rajasthan |
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| Abstract | ||
प्रतिरोध हमेशा से स्वतंत्रचेता होने की पहचान है, जो स्वतंत्र हैं या जिन्हें स्वतंत्र होने के मायने पता है और जो उसके लिए संघर्षरत हैं, वही व्यक्ति या समाज प्रतिरोध कर सकता है। प्रतिरोध जब सकारात्मक जीवन धर्मी मूल्यों के पक्ष में होता है तभी प्रासंगिक होता है। जो साहित्य समाज को प्रतिबिंबित करता है वही साहित्यकार एवं साहित्य पाठक के अंतःकरण की चेतना से संबंध होता है। वही साहित्य पाठक के बौद्धिक सांस्कृतिक और मानसिक चेतना का विवेचन करता है । और यदि साहित्य ऐसा करने में असमर्थ रहता है तो वह प्रासंगिक हो जाता है। |
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| Keywords | ||
| साहित्य] दलित] कविता] हिंदी | ||
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