हिन्द महासागर में महाशक्तियों की बढ़ती हुई भूमिका: भारतीय सामुद्रिक सुरक्षा के विशेष संदर्भ में

Vol-8 | Issue-09 | September-2021 | Published Online: 13 September 2021    PDF ( 263 KB )
DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i09.008
Author(s)
श्याम मोहन अग्रवाल 1; डाॅ. संजय कुमार शर्मा 2

1प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

2पोस्ट डाॅक्टरल फेलो, आई.सी.एस.एस.आर., न्यू देहली

Abstract

भारत को हिन्द महासागर अपना प्रभुत्व जमाने की आवश्यकता है ताकि संभावित खतरे से देश की सुरक्षा की जा सके। संयुक्त राज्य अमेरिका अपने स्त्रातजिक सुरक्षा के लिए हिन्द महासागर में पहल करना चाहता है। तो सोवियत संघ उसे निष्क्रिय बनाने के लिए अपने तटीय अड्डों को तथा नौसेना को समृद्ध बनाने में प्रयत्नशील है ताकि अपने हितों की सुरक्षा में कम से कम उसके पास द्वितीय प्रहारक क्षमता मौजूद रहे। इस प्रतिस्पर्धी की स्थिति में हिन्द महासागर में दोनों महाशक्तियों के सिद्धांत ने नयी दिशा प्रदान कर दी है। आज विश्व का जो कुछ भी तनाव या आणविक हथियारों की वृद्धि की परिकल्पना है इसी प्रथम प्रहारक क्षमता और द्वितीयक प्रहार क्षमता प्राप्त करने की दिशा में अत्यंत विस्फोटक रूप धारण करती जा रही है। नयी-नयी तकनीकी का विकास और हथियारों की क्षमता में गुणात्मक वृद्धि 1979 में अफगानिस्तान ने सोवियत संघ के हस्तक्षेप के बाद अमेरिका ने अनिवार्य रूप से अपनी स्थिति हिन्द महासागर में चाही है। यह 1980 की स्थिति दोनों महाशक्तियों के हिन्द महासागर में 21वीं सदी के हथियारों के दौड़ की स्थिति है। दिन-प्रतिदिन इनके हितों का सीमा क्षेत्र बढता जा रहा है, हथियारों की दौड़ बढ़ती जा रही है जो हिन्द महासागर के तटीय राष्ट्रों के लिए एक चिन्ता का विषय बना हुआ है उसमें प्रमुख रूप से चिंतनीय विषय भारत का है क्योंकि जिस प्रकार से इन महाशक्तियों के हित हिन्द महासागर से जुड़े है ठीक उसी प्रकार से भारत के मार्मिक हित हिन्द महासागर से जुडे है साथ ही साथ इसका सम्पूर्ण तट हिन्द महासागर से जुडा है। इन महाशक्तियों की अस्त्र स्पर्धा से भी भारत को हमेशा खतरा महसूस होता है। इसलिए इसे शान्ति का क्षेत्र बनाने के लिए भारत पूर्णरूप से समर्पित है।

Keywords
हिन्द महासागर, नौ-सैनिक, अमेरिका, भारत, चीन, सोवियत संघ (रूस), महाशक्तियाॅ।
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