लोक साहित्य के पारिवेशिक संदर्भ
| Vol-1 | Issue-1 | August-2014 | Published Online: 05 August 2014 PDF ( 375 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| Dr. Rekha Mishra 1 | ||
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1Lecture (Hindi), Government College, Sikrai (Dausa), Rajasthan |
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| Abstract | ||
लोक साहित्य किसी समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान का जीवंत दर्पण है। यह न केवल कथाएँ, गीत, कविताएँ और कहानियाँ प्रस्तुत करता है, बल्कि समाज के मूल्य, परंपराएँ, विश्वास और जीवन शैली को भी प्रतिबिंबित करता है। लोक साहित्य को उसके पारिवेशिक संदर्भ में समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ ही इसके निर्माण और संवर्धन को आकार देती हैं। सामाजिक संदर्भ लोक कथाओं में जाति, वर्ग, लिंग और समुदाय के नियमों और संघर्षों को दर्शाता है। भौगोलिक और प्राकृतिक संदर्भ किसी क्षेत्र की जलवायु, भूमि और प्राकृतिक परिवेश को प्रतिबिंबित करता है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ लोक साहित्य में सामूहिक स्मृति, युद्ध, शासन और परंपराओं के अनुभव को जीवित रखते हैं। धार्मिक और नैतिक संदर्भ लोक कथाओं और गीतों में सामाजिक अनुशासन, नैतिक शिक्षा और सांस्कृतिक एकता बनाए रखने में सहायक होते हैं। अतः लोक साहित्य का अध्ययन उसके पारिवेशिक संदर्भ के माध्यम से समाज की मानसिकता, जीवन दृष्टि और सांस्कृतिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण साधन है। |
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| Keywords | ||
| लोक साहित्य, समाज, सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, मूल्य, परंपराएँ, विश्वास। | ||
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