गुलरा के बाबा का शैलीवैज्ञानिक अध्ययन
| Vol-8 | Issue-01 | January-2021 | Published Online: 15 January 2021 PDF ( 138 KB ) | ||
| DOI: https://doi.org/10.53573/rhimrj.2021.v08i01.018 | ||
| Author(s) | ||
| कुलदीप कुमार मौर्य 1 | ||
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1शोधार्थी, हिंदी विभाग, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर |
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| Abstract | ||
हिंदी कथा साहित्य में कथाकार मार्कण्डेय एक सशक्त रचनाकार रहे हैं। उनकी कहानियाँ हिंदी कथा साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। मार्कण्डेय भाव एवं भाषा के गंभीर लेखक हैं। उनकी कहानियाँ भारतीय परिवारों के जीवन शैली और उनके परिवेश का विश्लेषण करती हैं। जिनमें आम आदमी तथा मध्यवर्गीय परिवार की कथा-व्यथा है। इनकी कहानियों में संघर्ष और मोहभंग का नजारा भी देखने को मिलता है। मार्कण्डेय की भाषा शैली अनुकूल और आकर्षक होने के कारण उनकी कहानियाँ हिंदी कथा साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। यहाँ पर हम उनकी कहानी ‘गुलरा के बाबा’ जो कि उनकी पहली कहानी है और उनके कहानी संग्रह ‘पानफूल’ की चर्चित कहानी भी है। यह कहानी ग्रामीण परिवेश को हुबहू चित्रित करती है। यहाँ पर हम इसी कहानी ‘गुलरा के बाबा’ की बात कर रहे हैं। यह कहानी परिवेश, भाव, भाषा तथा शैली की अभिव्यंजना को अपने अंदर समेटे हुए है। |
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| Keywords | ||
| शैली, चयन, विचलन, समानान्तरता, अप्रस्तुत विधान। | ||
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